Land Registry – प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन भारत में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रक्रिया है जो संपत्ति के स्वामित्व को कानूनी मान्यता प्रदान करती है। हाल ही में सरकार ने भूमि और संपत्ति रजिस्ट्री के नियमों में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं, जिनका उद्देश्य प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और धोखाधड़ी-मुक्त बनाना है। इन नए नियमों के तहत, अब संपत्ति रजिस्ट्री के लिए कुछ विशेष दस्तावेज़ों की अनिवार्यता बढ़ा दी गई है। आइए जानते हैं कि नए नियमों के अनुसार किन पांच दस्तावेज़ों की आवश्यकता होगी और इन बदलावों का क्या महत्व है।
रजिस्ट्री नियमों में बदलाव क्यों जरूरी था?
भारत में संपत्ति से जुड़े मामलों में धोखाधड़ी, दोहरी रजिस्ट्री, और फर्जी दस्तावेज़ीकरण की समस्याएं लंबे समय से चली आ रही हैं। कई बार लोगों को संपत्ति खरीदने के बाद पता चलता है कि उनकी खरीदी गई जमीन पहले से ही किसी और के नाम पर है या उस पर कानूनी विवाद चल रहा है। ऐसी स्थितियों से बचने और रजिस्ट्री प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए सरकार ने नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य खरीदार और विक्रेता दोनों के हितों की रक्षा करना है।
पहला दस्तावेज़: पहचान प्रमाण (Identity Proof)
नए नियमों के अनुसार, संपत्ति की रजिस्ट्री के समय खरीदार और विक्रेता दोनों को अपना वैध पहचान प्रमाण प्रस्तुत करना अनिवार्य है। इसके लिए आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी, पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसेंस में से कोई भी दस्तावेज़ मान्य होगा। पहचान प्रमाण की आवश्यकता इसलिए है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लेन-देन में शामिल व्यक्ति वास्तविक है और किसी प्रकार की धोखाधड़ी नहीं हो रही है।
आधार कार्ड को विशेष रूप से महत्व दिया जा रहा है क्योंकि यह बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन से जुड़ा होता है। कई राज्यों में अब संपत्ति रजिस्ट्री के समय आधार आधारित ई-केवाईसी भी अनिवार्य कर दी गई है, जो प्रक्रिया को और अधिक सुरक्षित बनाता है।
दूसरा दस्तावेज़: निवास प्रमाण (Address Proof)
पहचान प्रमाण के साथ-साथ, खरीदार और विक्रेता को अपना निवास प्रमाण भी देना होगा। इसके लिए बिजली का बिल, टेलीफोन बिल, राशन कार्ड, बैंक स्टेटमेंट या किराया समझौता जैसे दस्तावेज़ स्वीकार किए जाते हैं। निवास प्रमाण यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति का वर्तमान पता सही है और उससे संपर्क किया जा सकता है।
यह दस्तावेज़ विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब भविष्य में किसी कानूनी मामले या विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है। सही निवास प्रमाण के आधार पर ही संबंधित पक्षों को नोटिस या कानूनी दस्तावेज़ भेजे जा सकते हैं।
तीसरा दस्तावेज़: मूल स्वामित्व दस्तावेज़ (Original Title Deed)
संपत्ति की रजिस्ट्री के लिए मूल स्वामित्व दस्तावेज़ सबसे महत्वपूर्ण है। इसमें पिछली सभी रजिस्ट्री, सेल डीड, और संपत्ति के स्वामित्व का पूरा इतिहास शामिल होना चाहिए। विक्रेता को यह साबित करना होगा कि वह संपत्ति का वैध मालिक है और उसे इसे बेचने का पूरा अधिकार है।
नए नियमों के तहत, पिछले 30 वर्षों की संपत्ति की श्रृंखला (chain of title) की जांच अनिवार्य कर दी गई है। इसका मतलब है कि यह देखना जरूरी है कि पिछले तीन दशकों में संपत्ति किन-किन लोगों के नाम पर रही है और सभी ट्रांजेक्शन कानूनी तरीके से हुए हैं या नहीं। इस प्रक्रिया को टाइटल सर्च कहा जाता है और यह संपत्ति खरीदने से पहले बेहद जरूरी है।
चौथा दस्तावेज़: एनओसी और क्लीयरेंस सर्टिफिकेट
नए नियमों के अनुसार, संपत्ति की रजिस्ट्री के समय विभिन्न प्रकार के एनओसी (No Objection Certificate) और क्लीयरेंस सर्टिफिकेट प्रस्तुत करना अनिवार्य है। इनमें शामिल हैं:
सोसाइटी या हाउसिंग बोर्ड का एनओसी: यदि संपत्ति किसी सोसाइटी या अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में है, तो उस सोसाइटी से एनओसी लेना जरूरी है जो यह पुष्टि करता है कि संपत्ति पर कोई बकाया नहीं है।
टैक्स क्लीयरेंस सर्टिफिकेट: संपत्ति कर का भुगतान अद्यतन होना चाहिए। नगर निगम या स्थानीय प्राधिकरण से टैक्स क्लीयरेंस सर्टिफिकेट प्राप्त करना आवश्यक है जो यह दिखाता है कि संपत्ति पर कोई टैक्स बकाया नहीं है।
बैंक या वित्तीय संस्थान का एनओसी: यदि संपत्ति पर कोई ऋण या गिरवी (mortgage) है, तो बैंक से एनओसी लेना अनिवार्य है जो पुष्टि करता है कि सभी देनदारियां चुकाई जा चुकी हैं।
कृषि भूमि के मामले में राजस्व विभाग का क्लीयरेंस: यदि कृषि भूमि को गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए बेचा जा रहा है, तो उसके लिए उपयुक्त परमिशन और क्लीयरेंस जरूरी है।
पांचवा दस्तावेज़: पैन कार्ड और टैक्स रिटर्न
संपत्ति की रजिस्ट्री के लिए खरीदार और विक्रेता दोनों को अपना पैन कार्ड देना अनिवार्य है। यह आयकर विभाग को संपत्ति के लेन-देन की जानकारी देने और टैक्स चोरी रोकने के लिए जरूरी है। नए नियमों के अनुसार, एक निश्चित मूल्य से अधिक की संपत्ति के लेन-देन में दोनों पक्षों के पैन विवरण रजिस्ट्री दस्तावेज़ों में दर्ज किए जाने चाहिए।
इसके अलावा, कुछ राज्यों में उच्च मूल्य की संपत्तियों के मामले में खरीदार से आयकर रिटर्न की प्रति भी मांगी जाती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि संपत्ति खरीदने के लिए इस्तेमाल की गई राशि कानूनी स्रोतों से है। यह काले धन के उपयोग को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण दस्तावेज़
उपरोक्त पांच मुख्य दस्तावेज़ों के अलावा, कुछ अन्य दस्तावेज़ भी परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक हो सकते हैं:
एनकम्ब्रेंस सर्टिफिकेट (EC): यह दस्तावेज़ पिछले 13 से 30 वर्षों में संपत्ति पर किए गए सभी लेन-देन का रिकॉर्ड होता है। यह सुनिश्चित करता है कि संपत्ति पर कोई कानूनी बोझ या ऋण नहीं है।
म्यूटेशन सर्टिफिकेट: कुछ राज्यों में संपत्ति के नाम परिवर्तन के लिए म्यूटेशन प्रक्रिया अनिवार्य है, जो राजस्व रिकॉर्ड में मालिक का नाम बदलती है।
डिजिटलीकरण और ई-रजिस्ट्री
सरकार संपत्ति रजिस्ट्री प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल बनाने की दिशा में काम कर रही है। कई राज्यों में अब ई-रजिस्ट्री की सुविधा उपलब्ध है, जहां दस्तावेज़ों को ऑनलाइन अपलोड किया जा सकता है और रजिस्ट्री की प्रक्रिया आंशिक या पूरी तरह से ऑनलाइन पूरी की जा सकती है। इससे समय की बचत होती है और पारदर्शिता बढ़ती है।
निष्कर्ष
संपत्ति रजिस्ट्री नियमों में किए गए ये बदलाव भारतीय रियल एस्टेट सेक्टर के लिए एक सकारात्मक कदम हैं। पांच महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों – पहचान प्रमाण, निवास प्रमाण, मूल स्वामित्व दस्तावेज़, विभिन्न एनओसी और क्लीयरेंस सर्टिफिकेट, तथा पैन कार्ड – की अनिवार्यता से धोखाधड़ी की संभावनाएं कम होंगी और संपत्ति लेन-देन अधिक सुरक्षित होगा।
यदि आप संपत्ति खरीदने या बेचने की योजना बना रहे हैं, तो सुनिश्चित करें कि आपके पास ये सभी दस्तावेज़ पूर्ण और अद्यतन हैं। एक अच्छे वकील या प्रॉपर्टी सलाहकार की मदद लेना भी बेहतर होता है जो आपको पूरी प्रक्रिया में मार्गदर्शन दे सके। याद रखें, थोड़ी सावधानी और सही दस्तावेज़ीकरण आपको भविष्य में होने वाली कानूनी परेशानियों से बचा सकता है।










